बुधवार 4 फ़रवरी 2026 - 09:09
दुनिया पर रहबर ए मुअज़्ज़म के असरात

हौज़ा / रहबर-ए-मुअज़्ज़म-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी सय्यद अली ख़ामनेई की फ़िक्री, सियासी और अख़लाक़ी रहनुमाई ने मौजूदा आलमी मंज़रनामे पर गहरे असरात मुरत्तब किए हैं। उनकी तालीमात ने न सिर्फ़ इस्तिमार-मुख़ालिफ़ सोच और मज़ाहमती शऊर को तक़वियत दी, बल्कि कमज़ोर कौम को ख़ुद-एतमादी, बसीरत और हक़ के साथ खड़े होने का हौसला भी अता किया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , यह एक फ़िक्री और मआशरती सवाल है, और इसका जवाब मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से दिया जा सकता है।मौजूदा दौर में यूँ तो ग़ैर-ए-एलानिया तौर पर पूरी दुनिया रहबर-ए-इंक़िलाब सय्यद अली ख़ामनेई (हिफ़्ज़हुल्लाह) की ज़ात-ए-मुबारक से फ़ायदा उठा रही है, लेकिन जो लोग खुलकर उनसे मुस्तफ़ीद हो रहे हैं वे मुख़्तलिफ़ क़िस्म के हैं।

उनमें से कुछ यह हैं:

1. फ़िक्री और नज़रियाती रहनुमाई:

कुछ लोग रहबर-ए-मुअज़्ज़म की तक़रीरों और तहरीरों से फ़िक्री व नज़रियाती रहनुमाई हासिल करते हैं। इस्लामी फ़िक्र, इस्तिमार-मुख़ालिफ़ सोच, ख़ुद-एतमादी और मज़ाहमत से मुतास्सिर होकर उसे अपनाते हैं, जिससे उन्हें बहादुरी, इज़्ज़त और सरबुलंदी हासिल होती है। ख़ास तौर पर नौजवानों और कमज़ोर व मजबूर लोगों को इससे बड़ा फ़ायदा पहुँचा है।

2. सियासी बसीरत:

उनके मानने वालों का मानना है कि रहबर-ए-इंक़िलाब आलमी फ़रेबी सियासत को मौजूदा दौर में सबसे बेहतर तरीक़े से समझते हैं। लोग ताक़तवर ममालिक के दबाव को पहचानने, मुस्लिम दुनिया के मसाइल को वसीअ नज़रिए से देखने में उनकी रहनुमाई से फ़ायदा उठाते हैं।

3. इंसानी, मआशरती, अख़्लाक़ी और सियासी रहनुमाई

एक बुलंद-ओ-बाला, नाबिग़ा-ए-रोज़गार शख़्सियत के तौर पर, जिनके पास आलमी, इंसानी, अख़लाक़ी, मआशरती और सियासी बसीरत मौजूद है, बहुत से लोग इस अहद में उनसे मुस्तफ़ीद होकर ख़ुद को क़वी और दुश्मन को कमज़ोर समझते हैं।
वे उनके बताए हुए उसूलों पर अमल करते हुए मसाइल, अख़लाक़ी अक़दार, सादा तर्ज़-ए-ज़िंदगी, दुनिया के हालात और कमज़ोरों की हिमायत को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाते हैं।
4. मज़ाहमती तहरीकों की हौसला अफ़ज़ाई:

कुछ अफ़राद और गिरोहों के लिए वह ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने, फ़िलस्तीन जैसे मसाइल पर आवाज़ बुलंद करने और ताक़त के सामने न झुकने की अलामत हैं।

5. सख़ाफ़ती और कल्चरल पहचान:

ईरान और उससे मुतास्सिर हल्क़ों में इमाम ख़ामनेई इस्लामी-इंसानी तहज़ीब की पहचान हैं और मग़रिबी सख़ाफ़ती ग़लबे के मुक़ाबले एक मुतबादिल सोच को मज़बूती देने का ज़रिया हैं।
नतीजा

इस मुख़्तसर जायज़े के बाद यह बात तय है कि आलमी, मंतक़ी और आज़ाद फ़िक्री मंज़रनामे पर उनकी मोअज़्ज़ज़ ज़ात ने ऐसा गहरा असर डाला है कि बातिल के सारे जाल मकड़ी के जालों की तरह कमज़ोर नज़र आने लगे हैं, और हक़ व सदाक़त अदल-ओ-इंसाफ़ की हुकूमत की तरफ़ सही राह देखने लगे हैं۔

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha